'१'
आधा-आधा बाँट लिया था हमने सबकुछ
पूरा जीवन
आधी छतरी, आधी रोटी, आधा बिछौना, आधी रजाई
आधा-आधा हर सपना, साझा-साझा हर पल
आधा सूरज, आधा चाँद, आधी सुबह, आधी शाम
सब्र था, सुकूं था
गुज़ारा आराम से होता था
मस्तियाँ थीं रौनकें थीं
हम दो नहीं एक थे
"मैं और मेरी ख्वाहिशें".
'२'
अब न कुछ आधा, न कुछ साझा
पूरी छतरी, पूरे से ज़्यादा बिछौना,
पूरी रजाई, पूरी रोटी
पर 'तू' तू है 'मैं' मैं हूँ
कभी तू मुझ पर
कभी मैं तुझ पर हावी
न सुकूं, न गुज़ारा
हम एक नहीं दो हैं
"मैं और मेरी ख्वाहिशें"
बस जंग है हर पल
जद्दोजहद
और एक जिस्म में,
जैसे एक छत के नीचे हम दो अजनबी
"मैं और मेरी ख्वाहिशें".