Thursday, 31 October 2013

आधा-आधा


                     '१'
आधा-आधा बाँट लिया था हमने सबकुछ
पूरा जीवन
आधी छतरी, आधी रोटी, आधा बिछौना, आधी रजाई
आधा-आधा हर सपना, साझा-साझा हर पल
आधा सूरज, आधा चाँद, आधी सुबह, आधी शाम
सब्र था, सुकूं था
गुज़ारा आराम से होता था
मस्तियाँ थीं रौनकें थीं
हम दो नहीं एक थे
"मैं और मेरी ख्वाहिशें".
                    '२'
अब न कुछ आधा, न कुछ साझा
पूरी छतरी, पूरे से ज़्यादा बिछौना,
पूरी रजाई, पूरी रोटी
पर 'तू' तू है 'मैं' मैं हूँ
कभी तू मुझ पर
कभी मैं तुझ पर हावी
न सुकूं, न गुज़ारा
हम एक नहीं दो हैं
"मैं और मेरी ख्वाहिशें"
बस जंग है हर पल
जद्दोजहद
और एक जिस्म में,
जैसे एक छत के नीचे हम दो अजनबी
"मैं और मेरी ख्वाहिशें".

Tuesday, 29 October 2013

पहरा

तू मेरा अक्स कि मैं तेरा
किसके नूर से रौशन
किसका चेहरा
तेरा रंग जो मुझ पर छाया वो
या मेरा जो तुझ पर
वो है गहरा
कौन फ़स्ल-ए-बहार
कौन सेहरा
बात इतनी सी तो है
रहने दो, जाने दो
मैंने कहाँ लगा रखा है
हर बात पर पहरा.

तेरे आने और तेरे जाने के बाद



मौसम आग उगल रहा था
मेरे अंदर सिरहन थी
मौसम सर्द था
मैं सुलग रही थी.
अक्सर ऐसा ही होता है
तेरे आने और तेरे जाने के बाद.

Monday, 14 October 2013

कीमत



कभी खाली जेब कि तरह
खाली, आवारा से फ़ुर्सत के लम्हे
जब चुराने और छीनने पड़े ख़ुद से
तब उनकी कीमत में समझ में आई.

देर



हर आहट पर खिड़की खोली
पर हर दस्तक हवा की थी
देर हो चुकी थी
सिमट के सो गया
अपनी ग़लतियों के ताबूत में.


कर्ज़दार


पी गयी घूँट-घूँट उम्र वो 'उम्मीद'
मेरे हर लम्हे की कर्ज़दार है
आलम ये कि न सूद का पता, न मूल का हिसाब
फिर भी कमबख्त का दामन नहीं छोड़ा जाता.