ज़िद पर आमादा बेइन्तहा बरसात ने उस रात सब कुछ इतना भिगो दिया था कि सूरज की पुरजोर कोशिश के बावजूद कब सूखेगा कोई ठिकाना नहीं। बुझा सा उसका मन, कभी कमरे के किसी कोने से दुबक कर, कभी छत से लटककर, कभी आईने के भीतर से, कभी खुली खिड़की के परे से उसे घूरता, इस कदर सुलग रहा था, कि उस पर बारिश का रत्ती भर असर नहीं। भीतर की तपिश इतनी, कि सर्द हवाएं भी लू सी लगती थीं और उन्हें चीरकर आती, गालों को छूती बरसात की फुहारें, धदकती लपटों सी। ऐसा लगता था मानो जिस्म में अनगिनत सुराख कर देंगी। एक अजीब सी घुटन थी। सीलन ही सीलन थी चारों तरफ और उससे माहौल में पैदा हुई एक अजीब सी मसमसाहट। अन्दर-बाहर आती-जाती हर एक सांस के साथ जैसे एक लिजलिजा सा कीड़ा अन्दर रेंग रहा था। ख़ामोशी इतनी की उसकी सांय-सांय कानों में गूंजती, एक अजीब सा कोहराम पैदा कर रही थी। फिर उस ख़ामोशी को भेदती टप-टप की आवाज़। एक ख़ास अन्तराल में, ख़ास तरीके से आहिस्ता-अहिस्ता, एक ख़ास आकार लेकर सीलिंग से टपकती मोटी-मोटी बूंदों के साथ जैसे पिघल-पिघलकर, कतरा-कतरा ज़मीर कच्ची ज़मीन पर गिरकर बह रहा था और बेआवाज़ कह रहा था 'समेट लो, सहेज लो मुझे'। मगर उसके पास वो मिट्टी का खाली सकोरा कहाँ था जिसमें वो उसे समेट और सहेज पाता।
वो पूरे जिस्म के बोझ को एक साथ उठाये, उसे घसीटकर, इतनी ताक़त से इतना दूर, इतना ऊपर फ़ेंक देना चाहता था कि वो ज़मीनी ताक़त के परे चला जाए। सारे बोझ से आज़ाद होकर आवारा, आज़ाद परिंदे की तरह आसमान में तैर सके, बादलो में डुबकियाँ लगा सके। जब दिल किया तब पानी की सतह पर उतरे, उसे छुए और फिर उड़न-छू हो जाए। इतनी आज़ादी का ख्वाहिशमंद था वो। मगर कहाँ से आती इतनी आज़ादी? वो तो गुज़र रहा था लम्बी मुसलसल सुरंग से जो ख़त्म होने का नाम ही न लेती। रोशनी के किसी सिरे से जिनका मानो कोई ताल्लुक ही न था, बस बिना किसी मोड़ के चलती ही जाती थी। कभी संकरी से और संकरी हो जाती मगर खुलती नहीं थी। सामान कुछ भी साथ नहीं था फिर भी कितना बोझ था जैसे सब कुछ पीठ पर लदा साथ हो । ये बोझ उस ग्लानि का था जिससे उबर नहीं पा रहा था वो ।
अगली सुबह उसे सज़ा के तौर पर फांसी होनी थी मगर सुबह के इंतज़ार में रात नहीं कट रही थी। वो जान चुका था कि फांसी की सज़ा पाकर भी उसकी आत्मा उस अपराध बोध के बोझ से मुक्त नहीं हो सकती जो उसने किया था।
न जाने कब तक इस लम्बी सुरंग के भीतर रहना था उसे।
न जाने कब तक इस लम्बी सुरंग के भीतर रहना था उसे।