Tuesday, 5 May 2020

सुरंग


ज़िद पर आमादा बेइन्तहा बरसात ने उस रात सब कुछ इतना भिगो दिया था कि सूरज की पुरजोर कोशिश के बावजूद कब सूखेगा कोई ठिकाना नहीं। बुझा सा उसका मन, कभी कमरे के किसी कोने से दुबक कर, कभी छत से लटककर, कभी आईने के भीतर से, कभी खुली खिड़की के परे से उसे घूरता, इस कदर सुलग रहा था, कि उस पर बारिश का रत्ती भर असर  नहीं। भीतर की तपिश इतनी, कि सर्द हवाएं भी लू सी लगती थीं और उन्हें चीरकर आती, गालों को छूती बरसात की फुहारें, धदकती लपटों सी। ऐसा लगता था मानो जिस्म में अनगिनत सुराख कर देंगी। एक अजीब सी घुटन थी। सीलन ही सीलन थी चारों तरफ और उससे माहौल में पैदा हुई एक अजीब सी मसमसाहट। अन्दर-बाहर आती-जाती हर एक सांस के साथ जैसे एक लिजलिजा सा कीड़ा अन्दर रेंग रहा था। ख़ामोशी इतनी की उसकी सांय-सांय कानों में गूंजती, एक अजीब सा कोहराम पैदा कर रही थी। फिर उस ख़ामोशी को भेदती टप-टप की आवाज़। एक ख़ास अन्तराल में, ख़ास तरीके से आहिस्ता-अहिस्ता, एक ख़ास आकार लेकर सीलिंग से टपकती मोटी-मोटी बूंदों के साथ जैसे पिघल-पिघलकर, कतरा-कतरा ज़मीर कच्ची ज़मीन पर गिरकर बह रहा था और बेआवाज़ कह रहा था 'समेट लो, सहेज लो मुझे'। मगर उसके पास वो मिट्टी का खाली सकोरा कहाँ था जिसमें वो उसे समेट और सहेज पाता। 
वो पूरे जिस्म के बोझ को एक साथ उठाये, उसे घसीटकर, इतनी ताक़त से इतना दूर, इतना ऊपर फ़ेंक देना चाहता था कि वो ज़मीनी ताक़त के परे चला जाए। सारे बोझ से आज़ाद होकर आवारा, आज़ाद परिंदे की तरह आसमान में तैर सके, बादलो में  डुबकियाँ लगा सके। जब दिल किया तब पानी की सतह पर उतरे, उसे छुए और फिर उड़न-छू हो जाए। इतनी आज़ादी का ख्वाहिशमंद था वो। मगर कहाँ से आती इतनी आज़ादी? वो तो गुज़र रहा था लम्बी मुसलसल सुरंग से जो ख़त्म होने का नाम ही न लेती। रोशनी के किसी सिरे से जिनका मानो कोई ताल्लुक ही न था, बस बिना किसी मोड़ के चलती ही जाती थी। कभी संकरी से और संकरी हो जाती मगर खुलती नहीं थी। सामान कुछ भी साथ नहीं था फिर भी कितना बोझ था जैसे सब कुछ  पीठ पर लदा साथ हो । ये बोझ उस ग्लानि का था जिससे उबर नहीं पा रहा था वो । 
अगली सुबह उसे सज़ा के तौर पर फांसी होनी थी मगर सुबह के इंतज़ार में रात नहीं कट रही थी। वो जान चुका था कि फांसी की सज़ा  पाकर भी उसकी आत्मा उस अपराध बोध के बोझ से मुक्त नहीं हो सकती जो उसने किया था। 
न जाने कब तक इस लम्बी सुरंग के भीतर रहना था उसे। 

भूरी अटेची

आज उन तमाम पुरानी क़िताबों की धूल झाड़कर फिर से उनके पन्ने पलटने को जी किया, जिन्हें इतने बरस ना जाने क्यूँ में सहेजकर रखा था। छपे अफ़सानो के परे उन क़िताबों के हर सफ़हे में हमारे मासूम क़िस्से क़ैद थे। बेशुमार यादें पोशीदा थीं।उम्रदराज़, पीले पड़ चुके पन्नो पर तुम्हारी बेहद नाज़ुक, मासूम उँगलियों के निशान अब तक ताज़ा हैं, जो सिर्फ मुझे नज़र आते हैं। आम के अचार की गंध आज भी आती है उन पन्नो से, दुनिया के सबसे सुंगधित फूलों और इत्रों की सुगंध भी इतनी नहीं भाती मुझे।
अचानक दिल किया तो टीन का डब्बा खोला । इमली के चियों की चमक आज भी बरक़रार है, जो पसीने से नम तुम्हारी मुट्ठी से फिसले और आँगन में छूट गए थे। तुम्हारी अम्मा के पुकारने पर "अष्टा-चंगा-पै" खेलती-खेलती तुम भाग गयीं थीं और मैंने सबकी नज़रें बचाकर उन्हें बटोरकर अपनी हाफ पैंट की दाहिनी जेब में भर लिया था। मानो खज़ाना मिल गया गया हो। वो लाल रंग का रिबन, जो तांगा पकड़ने को भागते-भागते तुम्हारी चोटी से सरक गया था, उसकी आधी खुली, आधी बंधी गाँठ अब तक वैसी ही है। मेरी मनःस्थिति कि तरह। 
तुम्हारे सफ़ेद पीटी शूज के नीले तस्मे, छत पर छूट गयी एक जोड़ी पीली जुराबें, हैंडपंप के पास गिरा तुम्हारा गुलाबी क्लिप। पुरानी टेकरी से तुम्हारे हवा में उड़ाए कागज़ी हवाई जहाज़ और बरसाती पोखरों में छोड़ी तुम्हारी वो तमाम कागज़ी कश्तियाँ, सारी चीज़ें भूरी अटैची के नीचे वाले में खाने में ऐसे हिफाज़त से रखी हैं जैसे वो अटैची नहीं कोई म्यूजियम हो।
पांचवी से दसवीं तक की वो पांच 'सालाना' ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें जिनमें सारी क्लास कैमरा में देखकर मुस्कुराती नज़र आती है, लेकिन तुम्हारे पीछे की कतार में खड़ा सिर्फ तुम्हारी तरफ देखता मैं। तुम्हारी साइकिल की टूटी घंटी, खाकी बस्ते का काला पढ़ चुका स्टील का बक्कल। तुम्हारी पेसिलों के छिलकों से भरे कंपास बॉक्स आज भी मेरे पास बैंक लॉकर मैं रखे कीमती जवाहरात की तरह  सुरक्षित हैं। तुम्हारे जन्मदिन पर तुमने दी हर चॉकलेट की रंग -बिरंगी पन्नियाँ क़िताबों के पन्नो के बीच आज भी महफूज़ हैं । इतनी सारी यादें हैं। और हाँ कुछ ख़त भी हैं जो मैंने तुम्हे लिखे थे और खुद ही ख़ुद को उनके जवाब भी।
बत्तीस साल बाद, स्कूल के वाट्स अप ग्रुप पर आने में  तुमने पूरा एक साल, साढ़े तीन महीने, पाँच दिन लगा दिए, मिसेज़----।
बच्चे, भूरी अटेची को उत्सुकता से और स्टोर रूम में बैठे, बेवजह मुस्कुराते मुझे बीवी हैरानी से देख रही है और मैं उससे ठीक उसी तरह नज़रें चुरा रहा हूँ जैसे तुमसे चुराया करता था।