Friday, 24 March 2023


चलो ना एक बार फिर से शुरूवात करते हैं, 

पुरानी यामाहा की मरम्मत करवाकर अपना रिश्ता रिपैर करते हैं 

बिना गूगल मैप, बिना रेनकोट बरसात में लोंग ड्राइव पर चलते हैं , बिना फ़िक्र की सर्दी लग जाएगी 

लग भी गयी तो गर्म पानी में काली रम पी लेंगे  

चलो उसी रास्ते पर चलते हैं जहां कुछ लम्हे छूटे हैं 

वही जिन्हें अक्सर तुम पुरानी तस्वीरों की अल्बम में खोजती हो 

फिर हम दोनो  की तरफ  देखती हो 3 हज़ार फ़ुट के डूप्लेक्स में 

सब कुछ क़रीने से सजा, मगर उन लम्हों सा कुछ नहीं 

ठिठक जाती हैं तुम्हारी नज़रें सुंदेचक पर फुदकती गिलहरी पर 

उससे ज़ल्लस फ़ील करती हो, जायज़ है तुम्हारी जलन  


chalo na phir ek baar shuru se shuwaat karte hain 




purani yamaha ki marmmat karwakar khud ko / apna rishta  repair karte hain.
bina google map, bina raincoat barsaat mein long ride par chalte hain, bina fikr ki sardi lag jayegi...
lag bhi gayi to garm paani ke saath udhaar ki kaali sasti wali rum pee lenge... 

chalo phir usi raaste par chalte hain jahan peechhe kuchh lamhe chhoote hain... wahi jinhe aksar tum purani tasveeron ki album mein talashti ho... phir hum dono ki taraf dekhti ho to 3 hazaar Sq feet ke  duplex mein, sabkuchh kareene se saja hai magar un lamhon sa kuchh nahi... thithak jaati hain tumhari nazaren sundeck par phudakti gilhari par tumhe usse jalan hoti hai...  jaayaz hai tumhari jalan....sirf chehre wahin hain humare aur hum khud se ajjnabi ... suno na isiliye kahta hun chalo phir se shuru se shuruwaat karte hain. 
chalo na phir man ki baaten khaton mein likhakr wahi jaan pahchaan banaate hain... chalo na phir se chaadar mein munh dhakkar  landline par saari saari raat batiyaate hain... 
chalo na phir wahi lamhe chunte hain, kuchh nayi yaadon ki tasveeren banate  hain...
galati se laal batti hi to jump kee hai yaar
chalo na ik chalaan kataakar phir aage badhte hain...
is baar thoda sambhkar sambhalkar... 
chalo na us 1 room kitchen mein jhaankar aate hain jahan jeben khaali phir bhi  har sham jashn thee... chalo na phir se shuru se shuruwaat karte hain. chalo na jeete hain phor se. purani yamaha ki marammat karwakar khud ko repair karte hain. (23/11/22)


intazar karti darwaaze ki chaukhat ke chehre par bhi salwaten aa gayi hain
dehri bhi bechain hai

subah ki ek pyali chaay tumhrae saath adrak wali mere haath ki
uski bhaap ke peechhe se tumhari alsaayi aankhen, chaay ki chuski lete honth mujhe poore din ke liye energy dete hain... phir din bhar ki har chaay pheeki lagti hai...200 wali capachino bhi paani kam lagti hai...  bas yun ho har subah tumhare saath peeni hai mere haath ki adrak wali chaay....  

Tuesday, 5 May 2020

सुरंग


ज़िद पर आमादा बेइन्तहा बरसात ने उस रात सब कुछ इतना भिगो दिया था कि सूरज की पुरजोर कोशिश के बावजूद कब सूखेगा कोई ठिकाना नहीं। बुझा सा उसका मन, कभी कमरे के किसी कोने से दुबक कर, कभी छत से लटककर, कभी आईने के भीतर से, कभी खुली खिड़की के परे से उसे घूरता, इस कदर सुलग रहा था, कि उस पर बारिश का रत्ती भर असर  नहीं। भीतर की तपिश इतनी, कि सर्द हवाएं भी लू सी लगती थीं और उन्हें चीरकर आती, गालों को छूती बरसात की फुहारें, धदकती लपटों सी। ऐसा लगता था मानो जिस्म में अनगिनत सुराख कर देंगी। एक अजीब सी घुटन थी। सीलन ही सीलन थी चारों तरफ और उससे माहौल में पैदा हुई एक अजीब सी मसमसाहट। अन्दर-बाहर आती-जाती हर एक सांस के साथ जैसे एक लिजलिजा सा कीड़ा अन्दर रेंग रहा था। ख़ामोशी इतनी की उसकी सांय-सांय कानों में गूंजती, एक अजीब सा कोहराम पैदा कर रही थी। फिर उस ख़ामोशी को भेदती टप-टप की आवाज़। एक ख़ास अन्तराल में, ख़ास तरीके से आहिस्ता-अहिस्ता, एक ख़ास आकार लेकर सीलिंग से टपकती मोटी-मोटी बूंदों के साथ जैसे पिघल-पिघलकर, कतरा-कतरा ज़मीर कच्ची ज़मीन पर गिरकर बह रहा था और बेआवाज़ कह रहा था 'समेट लो, सहेज लो मुझे'। मगर उसके पास वो मिट्टी का खाली सकोरा कहाँ था जिसमें वो उसे समेट और सहेज पाता। 
वो पूरे जिस्म के बोझ को एक साथ उठाये, उसे घसीटकर, इतनी ताक़त से इतना दूर, इतना ऊपर फ़ेंक देना चाहता था कि वो ज़मीनी ताक़त के परे चला जाए। सारे बोझ से आज़ाद होकर आवारा, आज़ाद परिंदे की तरह आसमान में तैर सके, बादलो में  डुबकियाँ लगा सके। जब दिल किया तब पानी की सतह पर उतरे, उसे छुए और फिर उड़न-छू हो जाए। इतनी आज़ादी का ख्वाहिशमंद था वो। मगर कहाँ से आती इतनी आज़ादी? वो तो गुज़र रहा था लम्बी मुसलसल सुरंग से जो ख़त्म होने का नाम ही न लेती। रोशनी के किसी सिरे से जिनका मानो कोई ताल्लुक ही न था, बस बिना किसी मोड़ के चलती ही जाती थी। कभी संकरी से और संकरी हो जाती मगर खुलती नहीं थी। सामान कुछ भी साथ नहीं था फिर भी कितना बोझ था जैसे सब कुछ  पीठ पर लदा साथ हो । ये बोझ उस ग्लानि का था जिससे उबर नहीं पा रहा था वो । 
अगली सुबह उसे सज़ा के तौर पर फांसी होनी थी मगर सुबह के इंतज़ार में रात नहीं कट रही थी। वो जान चुका था कि फांसी की सज़ा  पाकर भी उसकी आत्मा उस अपराध बोध के बोझ से मुक्त नहीं हो सकती जो उसने किया था। 
न जाने कब तक इस लम्बी सुरंग के भीतर रहना था उसे। 

भूरी अटेची

आज उन तमाम पुरानी क़िताबों की धूल झाड़कर फिर से उनके पन्ने पलटने को जी किया, जिन्हें इतने बरस ना जाने क्यूँ में सहेजकर रखा था। छपे अफ़सानो के परे उन क़िताबों के हर सफ़हे में हमारे मासूम क़िस्से क़ैद थे। बेशुमार यादें पोशीदा थीं।उम्रदराज़, पीले पड़ चुके पन्नो पर तुम्हारी बेहद नाज़ुक, मासूम उँगलियों के निशान अब तक ताज़ा हैं, जो सिर्फ मुझे नज़र आते हैं। आम के अचार की गंध आज भी आती है उन पन्नो से, दुनिया के सबसे सुंगधित फूलों और इत्रों की सुगंध भी इतनी नहीं भाती मुझे।
अचानक दिल किया तो टीन का डब्बा खोला । इमली के चियों की चमक आज भी बरक़रार है, जो पसीने से नम तुम्हारी मुट्ठी से फिसले और आँगन में छूट गए थे। तुम्हारी अम्मा के पुकारने पर "अष्टा-चंगा-पै" खेलती-खेलती तुम भाग गयीं थीं और मैंने सबकी नज़रें बचाकर उन्हें बटोरकर अपनी हाफ पैंट की दाहिनी जेब में भर लिया था। मानो खज़ाना मिल गया गया हो। वो लाल रंग का रिबन, जो तांगा पकड़ने को भागते-भागते तुम्हारी चोटी से सरक गया था, उसकी आधी खुली, आधी बंधी गाँठ अब तक वैसी ही है। मेरी मनःस्थिति कि तरह। 
तुम्हारे सफ़ेद पीटी शूज के नीले तस्मे, छत पर छूट गयी एक जोड़ी पीली जुराबें, हैंडपंप के पास गिरा तुम्हारा गुलाबी क्लिप। पुरानी टेकरी से तुम्हारे हवा में उड़ाए कागज़ी हवाई जहाज़ और बरसाती पोखरों में छोड़ी तुम्हारी वो तमाम कागज़ी कश्तियाँ, सारी चीज़ें भूरी अटैची के नीचे वाले में खाने में ऐसे हिफाज़त से रखी हैं जैसे वो अटैची नहीं कोई म्यूजियम हो।
पांचवी से दसवीं तक की वो पांच 'सालाना' ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें जिनमें सारी क्लास कैमरा में देखकर मुस्कुराती नज़र आती है, लेकिन तुम्हारे पीछे की कतार में खड़ा सिर्फ तुम्हारी तरफ देखता मैं। तुम्हारी साइकिल की टूटी घंटी, खाकी बस्ते का काला पढ़ चुका स्टील का बक्कल। तुम्हारी पेसिलों के छिलकों से भरे कंपास बॉक्स आज भी मेरे पास बैंक लॉकर मैं रखे कीमती जवाहरात की तरह  सुरक्षित हैं। तुम्हारे जन्मदिन पर तुमने दी हर चॉकलेट की रंग -बिरंगी पन्नियाँ क़िताबों के पन्नो के बीच आज भी महफूज़ हैं । इतनी सारी यादें हैं। और हाँ कुछ ख़त भी हैं जो मैंने तुम्हे लिखे थे और खुद ही ख़ुद को उनके जवाब भी।
बत्तीस साल बाद, स्कूल के वाट्स अप ग्रुप पर आने में  तुमने पूरा एक साल, साढ़े तीन महीने, पाँच दिन लगा दिए, मिसेज़----।
बच्चे, भूरी अटेची को उत्सुकता से और स्टोर रूम में बैठे, बेवजह मुस्कुराते मुझे बीवी हैरानी से देख रही है और मैं उससे ठीक उसी तरह नज़रें चुरा रहा हूँ जैसे तुमसे चुराया करता था।   

  

Saturday, 30 November 2013

संवाद


बात नहीं, तो शुरुवात नहीं, तो मुलाक़ात नहीं, तो साथ नहीं,
तो क्या दिन क्या रात,
इतनी न बिगड़े बात इसलिए चुप न रहो
वर्ना चुप 'चुपचाप' संवाद नहीं रिश्ता भी निगल  जाए
समय पिघल बह जाए, मौक़ा लौट न आये, बस मन पछताए
होती बात, तो होती शुरुवात, फिर मुलाक़ात और फिर साथ
न होता ऐसा अंत जैसे शून्य अनंत...............................

Wednesday, 27 November 2013

बन्दर के हाथ में डुगडुगी



सीखने का संयम नहीं
सिखाने का शौक़ है
भरी ऐसों की फ़ौज है
दुर्भाग्य
उनकी ही मौज है.
बन्दर के हाथ में डुगडुगी
आजकल
वो मदारी को नचाता है.
ये लाइने जिन्हे 'सादर'
समर्पित हैं
वे जानते हैं
मैं सही हूँ ये भी मानते हैं
मगर वो बदलेंगे नहीं
क्यूंकि
बन्दर गुलाटी मारना थोड़े ही छोड़ता है.

Thursday, 31 October 2013

आधा-आधा


                     '१'
आधा-आधा बाँट लिया था हमने सबकुछ
पूरा जीवन
आधी छतरी, आधी रोटी, आधा बिछौना, आधी रजाई
आधा-आधा हर सपना, साझा-साझा हर पल
आधा सूरज, आधा चाँद, आधी सुबह, आधी शाम
सब्र था, सुकूं था
गुज़ारा आराम से होता था
मस्तियाँ थीं रौनकें थीं
हम दो नहीं एक थे
"मैं और मेरी ख्वाहिशें".
                    '२'
अब न कुछ आधा, न कुछ साझा
पूरी छतरी, पूरे से ज़्यादा बिछौना,
पूरी रजाई, पूरी रोटी
पर 'तू' तू है 'मैं' मैं हूँ
कभी तू मुझ पर
कभी मैं तुझ पर हावी
न सुकूं, न गुज़ारा
हम एक नहीं दो हैं
"मैं और मेरी ख्वाहिशें"
बस जंग है हर पल
जद्दोजहद
और एक जिस्म में,
जैसे एक छत के नीचे हम दो अजनबी
"मैं और मेरी ख्वाहिशें".

Tuesday, 29 October 2013

पहरा

तू मेरा अक्स कि मैं तेरा
किसके नूर से रौशन
किसका चेहरा
तेरा रंग जो मुझ पर छाया वो
या मेरा जो तुझ पर
वो है गहरा
कौन फ़स्ल-ए-बहार
कौन सेहरा
बात इतनी सी तो है
रहने दो, जाने दो
मैंने कहाँ लगा रखा है
हर बात पर पहरा.