Saturday, 30 November 2013

संवाद


बात नहीं, तो शुरुवात नहीं, तो मुलाक़ात नहीं, तो साथ नहीं,
तो क्या दिन क्या रात,
इतनी न बिगड़े बात इसलिए चुप न रहो
वर्ना चुप 'चुपचाप' संवाद नहीं रिश्ता भी निगल  जाए
समय पिघल बह जाए, मौक़ा लौट न आये, बस मन पछताए
होती बात, तो होती शुरुवात, फिर मुलाक़ात और फिर साथ
न होता ऐसा अंत जैसे शून्य अनंत...............................

Wednesday, 27 November 2013

बन्दर के हाथ में डुगडुगी



सीखने का संयम नहीं
सिखाने का शौक़ है
भरी ऐसों की फ़ौज है
दुर्भाग्य
उनकी ही मौज है.
बन्दर के हाथ में डुगडुगी
आजकल
वो मदारी को नचाता है.
ये लाइने जिन्हे 'सादर'
समर्पित हैं
वे जानते हैं
मैं सही हूँ ये भी मानते हैं
मगर वो बदलेंगे नहीं
क्यूंकि
बन्दर गुलाटी मारना थोड़े ही छोड़ता है.

Thursday, 31 October 2013

आधा-आधा


                     '१'
आधा-आधा बाँट लिया था हमने सबकुछ
पूरा जीवन
आधी छतरी, आधी रोटी, आधा बिछौना, आधी रजाई
आधा-आधा हर सपना, साझा-साझा हर पल
आधा सूरज, आधा चाँद, आधी सुबह, आधी शाम
सब्र था, सुकूं था
गुज़ारा आराम से होता था
मस्तियाँ थीं रौनकें थीं
हम दो नहीं एक थे
"मैं और मेरी ख्वाहिशें".
                    '२'
अब न कुछ आधा, न कुछ साझा
पूरी छतरी, पूरे से ज़्यादा बिछौना,
पूरी रजाई, पूरी रोटी
पर 'तू' तू है 'मैं' मैं हूँ
कभी तू मुझ पर
कभी मैं तुझ पर हावी
न सुकूं, न गुज़ारा
हम एक नहीं दो हैं
"मैं और मेरी ख्वाहिशें"
बस जंग है हर पल
जद्दोजहद
और एक जिस्म में,
जैसे एक छत के नीचे हम दो अजनबी
"मैं और मेरी ख्वाहिशें".

Tuesday, 29 October 2013

पहरा

तू मेरा अक्स कि मैं तेरा
किसके नूर से रौशन
किसका चेहरा
तेरा रंग जो मुझ पर छाया वो
या मेरा जो तुझ पर
वो है गहरा
कौन फ़स्ल-ए-बहार
कौन सेहरा
बात इतनी सी तो है
रहने दो, जाने दो
मैंने कहाँ लगा रखा है
हर बात पर पहरा.

तेरे आने और तेरे जाने के बाद



मौसम आग उगल रहा था
मेरे अंदर सिरहन थी
मौसम सर्द था
मैं सुलग रही थी.
अक्सर ऐसा ही होता है
तेरे आने और तेरे जाने के बाद.

Monday, 14 October 2013

कीमत



कभी खाली जेब कि तरह
खाली, आवारा से फ़ुर्सत के लम्हे
जब चुराने और छीनने पड़े ख़ुद से
तब उनकी कीमत में समझ में आई.

देर



हर आहट पर खिड़की खोली
पर हर दस्तक हवा की थी
देर हो चुकी थी
सिमट के सो गया
अपनी ग़लतियों के ताबूत में.


कर्ज़दार


पी गयी घूँट-घूँट उम्र वो 'उम्मीद'
मेरे हर लम्हे की कर्ज़दार है
आलम ये कि न सूद का पता, न मूल का हिसाब
फिर भी कमबख्त का दामन नहीं छोड़ा जाता.


Sunday, 29 September 2013

मुनिया की ओर से स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई


१५ अगस्त २०१३, मुंबई ... 

हर साल की तरह आज भी मुनिया बहोत खुश है.
नमक में लिपटी तली हरी मिर्च के साथ वडा पाव का स्वाद लेती, फुटपाथ पर बसी अपनी दुनिया में मगन
मुनिया ने अम्मा से पूछा "पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी साल में एक-एक बार ही क्यूँ आते हैं, अम्मा?"
"पता नहीं, किसी पड़े-लिखे से पूछना" अम्मा का जवाब था.
मुनिया ने लाल-हरी चटनी से सनी हथेली को पूरी तन्मयता से चाटकर कहा "गजरे, गुलाब, गुब्बारों से ज्यादा झंडे बिकते हैं, अम्मा.
हर हफ्ते पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी आते तो कितना अच्छा होता, हर हफ्ते मनचाहा खाना" 
खिलखिला दी मुनिया.
इस ख्याल से ही उसकी आँखों में आई चमक देखने वाली थी.
दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक, ६७ वर्ष पहले स्वतंत्र हो चुके देश की आठ साल की, अधनंगी, भूखी मुनिया स्कूल जाने और खलेने-कूदने की उम्र में डेढ़ साल के भाई को पीठ पर लादे, सारा दिन ट्राफिक सिग्नल पर कभी गजरे, कभी गुलाब, तो कभी गुब्बारे बेचती है और इन दो ख़ास दिनों पर "मेड इन चाइना" भारतीय झंडे.

इन दो ख़ास दिनों में अच्छी बिक्री होती है, क्यूंकि झंडा गाड़कर देशभक्ति दर्शाने वालों से देश भरा पड़ा है.
मुनिया को पेट भर मनचाहा खाना मिलता है और खुश होकर, इम्पोर्टेड गाड़ियों के बंद काले शीशों को थपथपाती हुई वो कहती है, "Happy Independence Day" .

Friday, 27 September 2013

उसके जाने के बाद





उसके साथ ही सारी रौशनी चली गयी
अब सूरज को घर लाने से भी कुछ नहीं होगा.  

उसकी हथेलियों में ही मेरी तक़दीर की लक़ीरें थीं
अब उस तक़दीर के पलट जाने से भी कुछ नहीं होगा.

उसके होठों में मेरी हर मुस्कान का सबब था
अब बेशुमार खुशियाँ बरस जाने से भी कुछ नहीं होगा.

रूह की ठंडक थी वो
अब  आँगन में चांदनी उतर आने से भी कुछ नहीं होगा.

वो मौसम थी, हवा थी, सुकूं थी, सांस थी वो
अब सारी क़ायनात क़दमों में सिमट आने से भी कुछ नहीं होगा..

माना मैं देर से घर आया था माँ
मगर तूने जाने में जल्दबाज़ी क्यूँ कर दी

तेरे होने से ही तो मेरे होने के मानी थे
अब रोज़ वक़्त पर घर आने से भी कुछ नहीं होगा
अब रोज़ वक़्त पर घर आने से भी कुछ नहीं होगा।

Wednesday, 25 September 2013

इंतज़ार


आधी खुली खिड़की
पूरी पिघली मोमबत्ती
बारिश के छीटों से गीली चिलमन
एक नम तकिया
दीवार पर टंगी हवा से टेड़ी
गुज़रे लम्हों की गवाह
मुस्कुराती तस्वीरें
कांच के मर्तबान में क़ैद
सांस लेती रंग-बिरंगी मछलियाँ
प्याले में तैरती गुलाब की पंखुडियां
नींद से बोझिल दो पलकें
'न' बिखरी, 'संवरी' ज़ुल्फें
उनमें उलझा आधा बासी
मगर अब तक महक रहा
खुशबुएँ लुटाने को आतुर
साबुत गजरा
पपड़ियों के नीचे से
झांकते बेसुध होठों की
अब तक ताज़ा सी  लिपस्टिक
बिस्तर पर न कोई सिलवट
बस उसकी  पेशानी पर
उभर आयीं ढाई लकीरें
कह रही थीं गुज़री रात की कहानी
'रात' जो आज फिर कटी इंतज़ार में
पूछती रही वो रात लगातार
क्यूँ चुना तुमने
सिर्फ और सिर्फ इंतज़ार
थक चुकी रात
सोना चाहती थी
कमसकम एक बार
बिना इंतज़ार
सुकूँ  से पलकें मूंदे
आधी खुली खिड़की को
पूरी बंद करके
एक बार.  


Monday, 16 September 2013

बेज़ुबान नज़्में


चाँद, सितारे, बिजली, बादल, अश्क, अहसास, इबादत
ओस की बूंदे, झरने, पत्ते, दिल, मासूम मोहब्बत ...
मुझसे पहले जो शायर आये, ये सारे लफ्ज़ ले उड़े
बचे -खुचे जो रूखे -सूखे से थे
रूमानी शायरी से न जुड़े ...
मेरे हिस्से आये बस कुछ ख्याल
मेरे बेज़ुबान ख़याल
जो मेरे जहाँ को मुकम्मल बनाने को काफी थे ...
उनकी तरह मेरे ख्याल खनकते सिक्कों में तो
तब्दील न हुए पर किसी मजबूर की आवाज़ बन
उसकी व्यथा कह गए
जिंदगी के यथार्त से दो -दो हाथ कर गए
कभी सच का अक्स तो
कभी हक़ीक़त का सबब बन गए
मैं लिखता नहीं मगर जो कहता हूँ
वो बेमानी, बेमक़सद नहीं
इस बात का सुकून मुझे दे गए
अब ख़ुद से नज़रे नहीं चुरानी पड़ती
शब्दों की तलाश में शब्दकोष खंकालने नहीं पड़ते
बस ईमानदारी से अपने आसपास नज़रें दौडानी
और ख़ुद के भीतर झांकना पड़ता है
बेशक मैं दुरुस्त काफ़िये वाली शायरी नहीं लिख पाता
पर जो कह पाता हूँ उस पर शर्मसार नहीं होना पड़ता ….
और जिन्हें शर्मसार होना पड़ता है
वो ख़ुद  को टटोलने पर मजबूर हो जाते हैं
और मेरे पास लफ्ज़ नहीं फिर भी
मुझे कुछ और कहने की वजह मिल जाती है  
और मैं फिर से कुछ बेज़ुबान नज़्में बुनने  लगता हूँ.

मुर्ताज़


ज़िन्दगी के रेयाज़ियत* में 
नाकाम हो गया, 
मुहासिब* नहीं 
मुर्ताज़* जो था.


*Mathematics 
*हिसाब -किताब रखने वाला 
*योगी





तलबगार



तेरी तारीफ़ का तलबगार नहीं 
बस कोई इल्ज़ाम न लगा देना.

ये भी सबक


हर कहानी हो तेरी-मेरी ज़रूरी नहीं 
पर सबक सबके लिए होता है.


  

कान




सुना है दीवारों के भी कान होते हैं, देखा नहीं... 
मगर देखा है, 
कान हैं जिनके उन तक ना कोई बात पहोंचती है
न आवाज़.

गर्मियों की छुट्टियां


माँ के हाथ का कैरी का पन्हा, गली के नुक्कड़ की दुकान से ली चार आने की बर्फ, आठ आने के दही से बनी मलाईदार, मिट्टी के  कुल्हड़  वाली लस्सी यानी गर्मियों की  छुट्टियां …
पापा के बाज़ार से लाये दशहरी आम, आम से सने हाथ और तर होंठ, फिर भी आम की गुठलियों पर भाई -बहन की हाथ -पाई यानी  गर्मियों  की  छुट्टियाँ ….
चूल्हे पर पकी दादी के हाथ की बेसन की रोटी, बेंगन का भर्ता, दही में चूरी बासी रोटियां, महेरी,लपसी और सरसों के तेल में डूबा   चावल का खींच यानी गर्मियों की  छुट्टियां...
बर्फ की मलाई वाली दिए की शरबती चुस्की, महाराज बाड़े की मटके वाली कुल्फी,कैंथ और बेर से खट्टे दांत, टीन के कनस्तर से चुरायी  नमक में लिपटी गीली इमलियाँ यानी गर्मियों की छुट्टियाँ …
सौंधी -सौंधी खुशबू वाली पानी से तर, गर्म लू के थपेड़े झेलती खस की टटीयां, मिटटी के मटको वाली प्याऊ, जामुन की गुठलियों से रंगी, पतंग के माजे से कटी हथेलियाँ, यानी गर्मियों की छुट्टियाँ …
तकियों के नीचे दबे दस पैसे किराये पर लिए नंदन,चम्पक, चंदामामा,जेबों और टीन के में खनकते कंचे यानी गर्मियों की छुट्टियाँ…
खाली माचिस के खोखों, पुराने डाक टिकटों पर होड़, गर्मी से झुलसती दोपहर में  चोरी -छुपे पच्चीस पैसे में दुबे जी की दुकान से  किराये पर साइकिल ले उड़ जाना, दोस्तों के साथ सूनसान शहर नापकर आना , रेस लगाना, पकडे जाने पर पापा की फटकार यानी  गर्मियों  की छुट्टियाँ....
शाम से पहले ही छत पर चढ़ अँधेरा होने तक  ‘काट्टा हो, काट्टा हो ’ चिल्ला -चिल्लाकर पेंच  लडाना, कटी पतंग लूटने को पागलों  की तरह भागना, पेड़ों पर चढ़ जाना, गिरकर घुटने कोहनियाँ  छिलवाकर हर रोज़ माँ की डांट खाना फिर भी अगले दिन बाज़ न आना यानी गर्मियों की छुट्टियाँ …
बुआ,मामा, मौसी के घर धमा-चौकड़ी, उनके लाड पर इतराना, सारी ज़िदें मनवाना, गाँव के तालाब में डुबकियाँ लगाना यानी गर्मियों  की छुट्टियाँ …
छत पर पानी का छिडकाव कर लाइन से गद्दे लगाकर खुले आसमान के नीचे सोना, आइस -पाईस, कैरम, सितोलिया, लूडो, सांपसीडी,  व्यापार, लंगड़ीटांग, गिल्लीडंडा,ताश के पत्तों के खेलों पर झगड़ना, रूठना -मनाना, रोज़ नए खेल रचना यानी गर्मियों की छुट्टियाँ…
चार आने के आठ गोलगप्पे चार दोस्तों के साथ बांटकर खाना, सारे मोहल्ले को दिन रात सर पर उठाये रखना, चबूतरे वाली बूड़ी नानी की नाक में दम कर उसकी खूब सारी गालियाँ खाना और बेशर्मी से हँसना यानी गर्मियों की छुट्टियाँ...
कभी ख़त्म न हो हर पल यही दुआ करना यानी गर्मियों की छुट्टियाँ...
क्यूँ था इतना छोटा बचपन और इतनी छोटी वो गर्मियों की छुट्टियां...
मन नहीं भरा, बहोत याद आती हैं आज भी वो गर्मियों की छुट्टियाँ.

नया दस्तूर



नए ज़माने का नया दस्तूर
जो 'सहे' वो दोस्त, 
'कहे' वो दुश्मन.

"आम-के-आम गुठलियों के दाम" …. देश की आर्थिक परिस्थिती का विश्लेषण



"आम के आम गुठलियों के दाम" पढ़कर ये विज्ञापन ख़ुशी से उछल पड़ा गुलफाम
दो सौ ग्राम टूथपेस्ट की खाली tube लाओ,पचास ग्राम की "फ्री" ले जाओ.
माल बेचने वालों ने धंदे की बढ़िया जुगत लडाई है
पर ये बात बेचारे गुलफाम की समझ में कहाँ आई है.
वो तो समझता है फ़ायदे का सौदा है,
"कम्पनी का प्रचार जनता का फ़ायदा"
सुन रखा था उसने बरसों पुराना ये क़ायदा.
पहले नीम की दातून चबाकर दांत साफ़ करता था,
फिर घोड़ा छाप लाल दन्त मंजन से दांत घिसना सीख गया.
देश के विकास के साथ उसका भी विकास हुआ,
विकास के पहले दौर में उसने उंगली पर टूथपेस्ट रखकर दांतों को घिसा
और विकसित हुआ तो उन्गलियों में टूथब्रश आ फंसा.
बाप बना तो बच्चे के दांत निकलने से पहले ही हाथ में टूथब्रश थमा दिया
और एक विकासशील देश के विकासशील नागरिक होने का ऐलान कर दिया.
टूथपेस्ट, टूथब्रश सभ्यता की निशानी है, जो इस्तेमाल न करे वो अज्ञानी है,
सबको ये बताया गया सब ये जान गए
टूथपेस्ट, टूथब्रश सभ्यता की निशानी है ये मान गए.
ऐसे में ये विज्ञापन तो वरदान है, जो इसका फ़ायदा न उठाये वो नादान है.
चतुर गुलफाम भला अपनी गिनती नदानो में क्यूँ होने देता,
मौका गवां देता तो कमबख्त विज्ञापन क्या उसे चैन से सोने देता?
"आम के आम गुठलियों के दाम" गुलफाम सोचकर ही मन-ही-मन मुस्कुराया
कहा मैं तो गुठलियों के भी बनाऊंगा बादाम
अजी गुठलियों की छोडिये छिलकों के भी वासूलूँगा दाम.
ऑफर सीमित स्टॉक रहने तक है वो जानता था
खुद को टूथपेस्ट बनाने वाली कंपनी से बड़ा उस्ताद मानता था,
दफ्तर से घर लौटते हुए अगली शाम,
झेलते हुए बसों के धक्के और सड़कों के जाम
मोहल्ले के नुक्कड़ वाले नए आकर्षक सुपर स्टोर पर रुक गया गुलफाम.
घर पहुंचा तो थैले में खाने के खली डब्बे के साथ
दो सौ ग्राम वाले टूथ पेस्ट की दस ट्यूबे देखकर गुलफाम की बीवी चकराई,
पूछने लगी "क्लर्की छोड़कर क्या सेल्समैनी है अपनाई"?
जवाब में गुलफाम बीवी की नादानी पर मुस्कुराया,
बीवी से टीन का दो किलो का खाली डब्बा मंगवाया
टूथपेस्ट की ट्यूबें की उसमें खाली, बीवी ने भी गुलफाम की अक्लमंदी पर दी ताली.
खाली ट्यूबें लेकर वो उलटे पैरों सुपर स्टोर पर आया,
सेल्स मन उसे देखकर चकराया,
उसने पूछा "क्या दांतों पर लगाने के बजाये तूने सारे ख़ानदान को टूथपेस्ट से है नहलाया?"
चतुर गुलफाम सेल्समैन की नादानी पर भी मुस्कुराया,
बोल "मत पूछ कि मैंने आमों को काटकर खाया या उनका मैंगोशेक बनाया
पचास ग्राम के दस टूथ पेस्ट फ्री में मेरे हवाले कर, इन गुठलियों के दाम दे".
विकासशील देश का नागरिक गुलफाम बड़ी तेज़ी से विकास की एक और सीढ़ी चढ़ गया
उसके घर का स्टेटस बढ़ गया,
घर के हर सदस्य के नाम एक-एक टूथपेस्ट हो गया
किसकी ट्यूब ज्यादा दिन चलेगी बच्चों में होड़ लग गयी.
टूथपेस्ट कि ट्यूब बस्ते में रख बच्चे स्कूल भी ले जाने लगे,
पिपरमेंट का ठंडा स्वाद लेने के लिए कभी-कभी टूथपेस्ट खाने लगे.
मिसेज गुलफाम दो किलो के टीन के डिब्बे में भरा टूथ पेस्ट पड़ोसनो को दिखाती थीं,
अपने पति की चतुराई पर इतराती थी,
ऑफर ख़त्म हो चुका था पडोसने मौके का फ़ायदा नहीं उठा पायी थी
इस बात का पड़ोसनो को अफ़सोस था,
इधर गुलफाम की जेब में हो गया मोटा सा छेद था
पर बेखबर गुलफाम को नहीं कोई खेद था.
ख़ुद की समझ में तो उसने कंपनी को लगाया था चूना
मौके का उठाया था फ़ायदा दूना,
दो किलो के दाम देकर वो ढाई किलो टूथपेस्ट लाया था
कंजूसी से इस्तेमाल करके परिवार ने उसे बरसों चलाया था.
किसी को पता नहीं डिब्बे में नीचे का टूथपेस्ट कब का गया था सड
उसमें न जाने कितने ज़हरीले कीटाणु गए थे पड,
डिब्बे के नीचे वाले टूथपेस्ट के जब उस हिस्से का नंबर आया
देखते ही देखते घर में मातम छाया.
महीनो पहले गुज़र चुकी एक्सपायरी डेट की बदौलत गुज़र गए गुलफाम के दो मासूम बच्चे.
कंपनी ने ऑफर के बहाने करीब आ रही एक्सपायरी डेट का माल लगाया था ठिकाने
मुनाफाखोरी की इस आग में गुलफाम जैसे जल गए न जाने कितने परवाने.
मगर विकासशील देश की विकासशील सरकार को गुलफाम की फिक्र क्यूँ कर होती
माल बेचने वाली विदेशी कम्पनियों के चंदे से ही तो जलती है उनकी सभाओं की ज्योति.
मरे गुलफाम का परिवार तो मरता रहे
सरकार र्जिदा रहनी चाहिए.
उनकी जेबें भरी रहें तो ज़हर का व्यापार भी जायज़ है
ईमानदारी से कोई करे विरोध तो वो नाजायज़ है,
ऐसी व्यवस्था में गुलफाम की क्या थी हस्ती,
उसके बच्चों की जिंदगी पचास ग्राम टूथपेस्ट की तुलना में कई गुना थी सस्ती;
न्याय के दरवाज़े का रास्ता जिस ओर गया वो भी निकली लुटेरों की बस्ती.
चंद रोज़ में अख़बारों में छपी ख़बरें भी खामोश हो गयीं
दौलत की स्लीपिंग पिल से अखबारों, न्यूज़ चैनल्स की संवेदनाएं भी गहरी नींद में सो गई.
गुलफाम को अब 'आम के आम गुठलियों के दाम' जैसे विज्ञापन नींद में भी डराते हैं
वो दहशत से काँप जाता है...
लेकिन विकासशील देश कुछ और नए विदेशी प्रोडक्ट्स के लांच के साथ
विकास के पथ पर कुछ और सीडियां चढ़ जाता है.
मगर सुना है गुलफाम का बचा-खुचा परिवार
आजकल फिर से देसी घोड़ा छाप लाल दन्त मंजन लगाता है.
पड़ोस के बच्चे गुलफाम की खिल्ली उड़ाते हैं,
'आम के आम गुठलियों के दाम के चक्कर में बुरे फसे गुलफाम को याद आये राम' का नारा लगाते हैं
उधर कुछ बच्चे माँ बाप को टीवी पर आज ही आया नया विज्ञापन दिखाते हैं
क्या आप अपने बच्चों के सही पोषण के लिए उन्हें नया हेल्थ ड्रिंक पिलाते हैं?
बॉलीवुड की सुपरसेक्सी हीरोइन ने किया था देश की अति भावुक माताओं से ये सवाल
ज़ाहिर है विज्ञापन सुपर हिट और नए imported हेल्थ ड्रिंक ने market में मचा दिया बवाल.
सुना है "डॉलर" का रेट और बढ़ गया है.
"रुपया और गिर गया" ये कहने में अब शर्म आती है .

क्यूँ हैं फिर मिले ?


कुछ धुंधलाए से चेहरे फिर साफ़ नज़र आये
कुछ भूली-बिसुरी सी यादें फिर ताज़ा हो आईं
कुछ रिश्तों में फिर से साँसें आयीं
जब ज़िंदगी के इस मोड़ पर हम फिर मिले.
गुमशुदा मुस्कुराहटें फिर लौटी
ख़ामोश गीत फिर गुनगुनाये
बेचैनी को राहत आई
मन ने हिचकोले खाए
ठहरे पानी में बुलबुले उठे
न गिले न शिकवे, होंठ अब भी हैं सिले
कुछ मुरझाये  से सपने न जाने क्यूँ खिले
न जाने इस मोड़ पर हम क्यूँ हैं फिर मिले ?

ज़मीर




ज़िंदा जिस्मों में दफ़्न 'ज़मीर' 
खफ़ा हैं ख़ुदा से-
ये तो ज़िंदा न रख सके मुझे 
मगर तुमने कब्र तो पाक़ दी होती

मेरे ज़िद्दी ख़्वाब



मेरे ज़िद्दी ख़्वाब अब मेरे बस में नहीं रह गए हैं
जिन्हें चुना थे मैंने, बुना थे मैंने,
बोया था मैंने, सींचा था मैंने
बरसों जिनकी परवरिश की मैंने
अब वो अपने पैरों पर खड़े हो इतने ज़िद्दी हो गए हैं
की मेरे बस में नहीं रह गए हैं
पाला -पोसा था मैंने
हक़ीक़त के साए से महफूज़ रखा
यथार्थ की धूप, आंधी- तूफ़ान से 

हिफाज़त की जिनकी
जागती आँखों में सजाया था जिन्हें
खुद जागकर लोरियां गाकर सुलाया था
किसी रात जिनका सिराहना बनकर
कभी आलिंगन में लेकर सोया था जिन्हें
वही मेरे वजूद से भी बड़े हो गए हैं
मेरे ज़िद्दी ख़्वाब अब मेरे बस में नहीं रह गए हैं
ज़िद है उनकी वो सच होना चाहते हैं
अब रातों को ही नहीं
दिन भर मन की मुंडेर पर बैठे 

टकटकी लगाए ताकते हैं मुझे
मैं नज़रें चुराता हूँ तो 

ख्वाहिशों की दीवारों से सर टकराते हैं
कभी मुझे, कभी मेरे 'मैं' को ललकारते हैं,
हर पल मुझे चिड़ाते हैं,
मेरा मज़ाक उड़ाते हैं
अब वो मुझसे ज्यादा कद्दावर हो गए हैं
इसलिए मेरे ज़िद्दी ख़्वाब मेरे बस में नहीं रह गए हैं
मैं थकता हूँ तो थकने नहीं देते

थमता हूँ तो थमने नहीं देते
हारता हूँ, तो हारने नही देते
न ख़ुद चैन से सोते, न मुझे सोने देते हैं...
फिर भी मुझे वो अच्छे लगने लगे हैं क्यूंकि
सच्चा ख्वाब तो वही है 

जो नींद में न आये बल्कि नींद छीन ले
इसीलिए उनकी ये ज़िद अब मुझे अच्छी लगने लगी है
जिंदगी फिर एक बार नयी सी लगने लगी है
अब करवट बदलता हूँ तो

उन्हें सिराहने देख राहत पाता हूँ,
मालूम है, वो मुझे थकने नहीं देंगे,
रुकने नहीं देंगे तब तक

जब तक वो सच नहीं हो जाते...

वक़्त ज़ाया कर दिया



शोर-शराबे और भीड़ भरे, 
शोहरतों के वो मेले भी वक़्ति थे 
बदलते हर मौसम की तरह,
मेलों में आसमान से टकराने को आतुर

तो कभी ज़मीन छूते, हिचकोले खाते
कामयाबी के ऊंचे-ऊंचे झूले भी 

वक़्ति थे जिंदगी के उतार-चढ़ाव की तरह
मन की दूकान पर लटकी 

बिकने को आतुर रंग -बिरंगी ख्वाहिशें
नीली-पीली, गुलाबी वक़्ति थीं
खाओ-न-खाओ पिघलकर बह जाने वाली
आइसक्रीम की तरह
फिर भी हम सबने सिर्फ़ और सिर्फ़ 

यही सब जुटाने में 
सारा वक़्त ज़ाया कर दिया.

आसां था और मुश्किल भी



जितना मुश्किल था ये आसां करना
बिखरे ख़यालों को शब्दों की हांडी में 

पकाकर कविता की शक्ल देना
उतना ही आसां था ये मुश्किल करना
सुकूं के ग़लत मायने चुन 

ज़िन्दगी को जद्दोजहद की ज़ंजीरों में जकड़ देना
और उसमें इस कदर उलझते जाना 

कि कविता करना फिर मुश्किल हो जाना.


तो बात बने



मेरे ख़यालों से नहीं, 
सवालों से मुतासिर हो
जवाब बन 
तो बात बने
मुझे दाद न दे 

ख़ुद ख़याल बन 
तो बात बने
हर शाम चराग़ जलाने को 

दियासलाई न ढूंढ 
ख़ुद रौशनी बन 
तो कुछ बात बने
बीमारी की दवा न ढूंढ

ख़ुद इलाज बन 
तो बात बने
कांधा देने, आंसूं पोंछने के बजाये 

किसी के आंसुओं की वजह न बन 
तो बात बने
मेरी 'हाँ-में -हाँ' न मिला 

तेरी 'ना' को मेरी 'हाँ' बना
तो बात बने.

गुज़र जायेंगे



बस इक दौर है ये इससे भी गुज़र जायेंगे 
कौन ठहरा है इस जहाँ में मुस्तक़िल*
न दौर, न वक़्त, न इंसां. 

(*Permanent )

सबक



इतने गूढ़ मत बनो कि
शब्दकोष में तुम्हारा अर्थ ढूँढना पड़े,
इतने जटिल मत बनो कि 

शोध के विषय हो जाओ
सरल, सहज हो जाओ 

'nursery rhyme' की तरह
जिसे तुतलाता बच्चा भी गुनगुना सके.





फिर एक नयी ग़ज़ल

आईने में ख़ुद से मुख़ातिब हो 
दो बातें जो कीं वो ग़ज़ल हो गयी
खुद से शिकायतें जो थीं वो नज़्म हो गयी
वक़्त की हांड़ी में उबलते कुछ सवाल थे
उन्हें हिलाया  

परतें उधेड़ी तो अफ़साने बन गए
समझोतों की सलीब पर लटके

कुछ सुलगते सच थे
जिन्हें छेड़ दिया तो शायरी हो गयी
भीतर आग थी 

जिसे कागज़ पर उगल दिया तो 
कविता हो गयी
न शब्द चुने, न उनका वजन तोला

न उन्हें सजाया-संवारा
फिर भी वो कोई गहरी बात कह गए
किसी के दिल को छू गए

किसी के मन में चुभ गए
किसी को प्रेरित 

तो किसी को उद्वेलित कर गए
रचनाकार की रचनाधर्मिता सफल हो गयी
फिर से आईने में ख़ुद से मुख़ातिब हो 

दो बातें जो कीं वो फिर
एक नयी ग़ज़ल हो गयी.

क्या बेहतर होता ?

क्या बेहतर होता 
हमने भी सीखा होता 
उनकी तरह जीना, हँसना, मुस्कुराना
ओस में भीगी दूब, धूप में चमकती रेत पर

दौड़ते हुए खिलखिलाना
ना कि दूब के कुचले जाने 

और खेल-खेल में बनाये 
किसी के रेत के घरोंदें टूटने के 
ख़याल से सहम जाना 
क्या बेहतर होता 
हमने भी सीखा होता 
अपनी आग दूसरों पर फेंक खुद को बचाना
ग़ैरों कि ज़मीन पर अपना आशियाँ बनाना
क्या बेहतर होता 

संवेदनशील होने से संवेदनाहीन होना?

दरख़्त

मन के आँगन में एक दरख़्त है
जो हर मौसम में खिला रहता है
वही है जो जीवन को सांसें देता है
वही है जो साँसें चुकने तक भी 

जीवित रहता है
कभी न बूढ़ा होने वाला ये दरख़्त...
जड़ों में माँ की परवरिश 

पिता की सीख
गुरु का खाद पानी
ख्वाहिशों सी लम्बी टहनियों पर 

लटके पुराने लम्हे,
कच्ची-पक्की यादों की पूरी एक फ़सल
फूटती कलियों में मासूम बचपन का अक्स
खिलते फूलों में बहकती जवानी की तस्वीर
खट्टे-मीठे फलों से से लदा-फदा 

शरारतें करता
तने की झुर्रियों से झलकती शिथिलता नहीं 

बल्कि तजुर्बे का तेज
इसी दरख़्त पर तिनकों एक घोसला है
जिसमें यादों का पूरा एक कुनबा रहता है
मन के आंगन में एक दरख़्त है
जो हर मौसम में खिला रहता है.

ज़िद

जिस मोड़ पर आकर हमारे रास्ते अलग हुए थे, 
मैं अब भी वहीँ खड़ा हूँ,
अजीब ज़िद है
न पलटके देखना तुम्हारी आदत है

न रास्ते बदलना मेरी फ़ितरत.

Sunday, 15 September 2013

उम्मीद


मेरी सख्त हिदायत पर सितारों की फ़ौज साथ लिए
सारी -सारी रात जाग चाँद करता रहा पहरेदारी
दरख्तों के साए भी थे चौकन्ने
झींगुर सतर्क, न चमगादड़ सोये, न उल्लूओं ने ली जम्हाई
फिर भी, आज फिर चुपके से वो याद न जाने कहाँ से आई
जो ले उडी मेरी नींद.
गुज़रे  मगर  ताज़े  किस्सों  की,
बीती  मगर  न  बिसुरी  बातों  की,
पिछली  मगर  जानी - पहचानी  आहटों  की,
धुंधले  से  ख्वाबों , गीले -सूखे  ख्यालों  की,
इतनी  थी  भीड़  की नींद आज फिर खो गयी
हर -रोज़ के इस सिलसिले से थक -कर बोझिल
एक आँख आखिर सो गयी मगर दूसरी आज भी
सुबह होने तक राह तकती रही न जाने किसकी
उसे अब भी  उम्मीद  है तो कोई  क्या  करे
उसकी  इसी  उम्मीद  ने  उससे  नींद  छीनी है
फिर भी उसे उम्मीद  है तो कोई  क्या  करे .

दरारें

वजूद में पड़ी दरारों को और गहरे चीरकर ही उसे सीना होगा
मर-मरकर नहीं किसी नए मक़सद के लिए जीना होगा,
वर्ना वक़्त का तूफ़ान होंसले डिगा देगा
सेहरा से तपते इरादों को भिगा देगा,
दरारें 'दर्रा' बनकर सबकुछ निगल जाएँगी
बंद मुट्ठियाँ न जाने कब खुली हथेलियों में बदल जाएँगी.

कलाकार

कल शाम ही तो मिला था बाज़ार में साज़ लिए अपने
धुन नहीं बिकती तो साज़ बेचने आया था...
सुबह ख़बर आई, कल रात वो गहरी नींद में सो गया
कलाकार था अपनी धुन में खो गया.

रौशनी

ठहरे पानी में डगमगाता साया, 
ज़िन्दगी ने कुछ ऐसे होश गंवाया
मुड़के भी न देखा फिर उस तरफ, 

हुआ वही जो आखिर उसने चाहा
गया उसी राह जहाँ से कल था आया 

पता नहीं क्या खोया क्या पाया ...
अर्थहीन सारा हिसाब जिसमें वक़्त गंवाया
भेद चुका जब सारे भेद तब मुस्कुराया..
अब लहरों में भी स्थिर है साया

न सन्नाटे हैं न शोर
बस आवाज़ें ख़ुद की 

रौशनी ही रौशनी ख़ुदा की
अब न मैं हूँ न मेरा साया...

दूरी

रास्ते ख़त्म होते गए 
मगर फ़ासले 'कम' भी न हुए,
दरअसल ये 'दूरी' नहीं 'मजबूरी' थी.

बेईमान आईने


बेईमानी का असर इस क़दर कि 
इन दिनों आईने भी झूठ बोलने लगे हैं 
गुमराह करने वाले चापलूसों की तरह. 

रोमांस

तेरे शहर से गुज़र के आया था वो झोंका
उसकी दीवानगी बता रही थी.
तूने छुआ था जिन 'काँटों' को
उनकी ख़ुशबू मौसमों को महका रही थी.
उस 'अँधेरे' पर तेरे ही नूर का असर था
जिसकी रौशनी मंज़िलों को बहका रही थी.
भटके रेतीले किनारों पर तेरे ही कदमों के थे वो निशां
बेफिक्र लहरों पर पड़ा वो तेरा ही था साया
तेरी सोहबत में न जाने किस-किसने होश गंवाया.
चांदनी ने चुपके से देखा था तेरा शर्माना
धुन ने सुना था तेरा गुनगुनाना .
कच्ची धूप को धीमी आंच पर पकाकर कुनकुनी,
ठंडी आहों से भर, शामों को सर्द, तूने ही बनाया
तेरी हर बात का असर था हर तरफ
कभी तूने ठुकराया, कभी अपनाया....
ऐ ज़िन्दगी ऐसा है तेरा-मेरा रोमांस,
ऐसा है तेरा -मेरा रिश्ता.

राख

ज़िन्दगी बग़ावत उगल रही है
कहीं एक सहमी सी आग सुलग रही है.
लपटों की आंच ही नहीं,
आँखों में चुभने वाला धुआं भी नज़र अंदाज़ कर रहे हैं हम
एवज में इंसानियत जलकर राख हो रही है.

इस शहर नाम के जंगल में

इस शहर नाम के जंगल में पता मिले 'इंसानियत' का 
तो बता देना
कोई 'दोस्त' मिले

तो बता देना...
शराफ़त के लिबास में लिपटे 'आदमखोरों' से निजात,
जो मिल जाये सो निगल जाएँ, ऐसे आँखें गढ़ाए 'गिद्ध' पलक झपकाएं,
घात लगाये 'चीतों' के इरादे नेक हो जाएँ 

तो बता देना...
इस शहर नाम के जंगल में जिस दिन फिर से सूरज उगे

तो बता देना...
किसी को जीने की 'सार्थक वजह' मिले,
'मैं' की भीड़ में लापता 'हम' मिले,
तेरा-मेरा खोया 'सुकूं' मिल जाए

तो बता देना...
रास्तों को मंज़िल, मंज़िलों को मक़सद मिल जाए

तो बता देना...
फ़सादों के बवंडर थम जाएँ, रिश्तों से खुशबुएँ महकें
तेवर नहीं, मुस्कुराहटें हों चार सूं

तो बता देना....
पेशानी पर बल नहीं, नज़रों में छल नहीं, 

चाल में चालें थम जाएँ,
हाथों से गले न नपे, हाथ मिले

तो बता देना....
बारिशों में खूं और तेज़ाब नहीं 'पानी' बरसे
जज़्बात की बंजर हुई ज़मीन पर 'मोहब्बत की फसलें' हों
आग 'आग ' नहीं होम हो जाए 

तो बता देना ....
सर्द मौसम हों 'संवेदनाएं' नहीं, 

गर्माइश रिश्तों में हो मिज़ाज में नहीं
आसमान में चील-कौए न मंडराए, 

तोता-मैना आज़ादी से पंख फड़फडाये,
सच, यकीन, हौसला नहीं , 

खौफ़, ख़तरा, स्वार्थ, कायरता पलायन कर जाएँ 
तो बता देना...
इन्सान जागे, शैतान दफ़्न हो जाए 

तो बता देना...
आईने जब सच बोलने लगें, 

परछाई जब साथ न छोड़े
आंसू झूठ न बोले, मैं तुझसे, तू मुझसे,
हम एक-दूसरे से और ख़ुद से नज़रें मिलाने के क़ाबिल हो जाएँ

तो बता देना..
ज़िन्दा रहा तब तक, तो लौट आऊंगा,
ये जंगल शहर हो गया, तो ज़रूर लौट आऊंगा.

तभी बदलेंगे हालात


बदलेंगे हालात अगर हो मन में जीत की आस
साँसें मुट्ठी में,हर धड़कन पर राज़ 
हो अगर मन में जीत की आस.
छोड़ मत विश्वास, ज़िंदगी हर पल नया प्रयास 
आज डूबता सूरज हरदम का अंधकार
ये तो बस तेरे मन का भास  
ऐसे हुए निराश तो न जीवन में होगा प्रकाश
भाग -भाग मत रुक  
सांस चुकने तक मत झुक 
तब बदलेंगे हालात, तभी बदलेंगे हालात.

जी के दिखा

बड़े बाप के बेटे थे,
जब से पैदा हुए लेटे थे,
क़ुसूर उनका नहीं,
खून में ही थीं अय्याशियाँ ...
बेशुमार छाई थी खुमारियां
ख़ुदा के करम से
बेपनाह थीं मेहरबानियाँ....
मुश्किलें कम,
ज़्यादा थीं आसानियाँ;
बस; यही बड़ी मुश्किल हो गयी
न आया झूझना, न लड़ना, न जीतना.
आसां-आसां सी ज़िन्दगी कुछ इतनी आसां थी की
जब असल में जीने की बारी आई (हमारी तरह)
तो लग गयी जनाब की
बौराए से फिरते थे,
फ.... गयी जनाब की.  

(कुछ शब्दों का चुनाव पसंद न आया हो तो माफ़ करें,
उस भाव को व्यक्त करने वाला पर्यायवाची मुझे नहीं सूझा. )

'मंज़िल' या 'मक़सद'


मंज़िलें तो हर मोड़ पर हैं मगर वो सिरा नज़र नहीं आता जिसे मक़सद कहा जाए 
बड़ी उलझन है यारो, 'मंज़िल' या 'मक़सद'  किसके लिए जिया जिया जाए? 

फ़ुर्सत


फ़ुर्सत के उन लम्हों को ढूँढता हूँ अब 
जो  काटने को दौड़ते थे कभी.

परछांई



ख़ुद की ही ऊँचाई को कहाँ छुआ है अब तक
याद दिलाती है मुझसे ऊंची मेरी परछांई .  

रफ़्तार

देख हर शख्स को बेसब्र इतना, सब्र ख़ुद  हैरान है
बेफ़िक्री इतनी कि फ़िक्र परेशान है 
कहाँ जायेगी इन बेसब्रों, बेफ़िक्रों की दुनिया 
इन्हें पता नहीं  ये रफ़्तार ही कमबख्त सबसे बड़ी शैतान है. 

खुशफ़हमी

जो घटा ही नहीं हमारे दरमियाँ वो भी सच सा लगता  है
जो कल था ही नहीं हर बात उसी कल की है ऐसा लगता है
जी चुके पूरी एक ज़िन्दगी तस्सवुर में
जो ख़्वाब ही रहा वही सच सा लगता है
इसे वहम कहें या नामुराद खुशफ़हमी
इसी वजह से तो आज भी जीना अच्छा लगता है.

ऐतबार

वो क्या ऐतबार करेंगे  मुझ पर
जिन्हें ख़ुद पर यकीं नही। 

मुश्किल

बहोत मुश्किल है ये याद रख पाना 
कि उसे भूल जाना  अब ज़रूरी है. 

वक़्त

वक़्त ने चेहरे पे जो अपनी निशानी छोड़ दी,
उन लकीरों में दफ़्न हैं ख़्वाहिशें पिछली तमाम।