Saturday, 30 November 2013

संवाद


बात नहीं, तो शुरुवात नहीं, तो मुलाक़ात नहीं, तो साथ नहीं,
तो क्या दिन क्या रात,
इतनी न बिगड़े बात इसलिए चुप न रहो
वर्ना चुप 'चुपचाप' संवाद नहीं रिश्ता भी निगल  जाए
समय पिघल बह जाए, मौक़ा लौट न आये, बस मन पछताए
होती बात, तो होती शुरुवात, फिर मुलाक़ात और फिर साथ
न होता ऐसा अंत जैसे शून्य अनंत...............................

Wednesday, 27 November 2013

बन्दर के हाथ में डुगडुगी



सीखने का संयम नहीं
सिखाने का शौक़ है
भरी ऐसों की फ़ौज है
दुर्भाग्य
उनकी ही मौज है.
बन्दर के हाथ में डुगडुगी
आजकल
वो मदारी को नचाता है.
ये लाइने जिन्हे 'सादर'
समर्पित हैं
वे जानते हैं
मैं सही हूँ ये भी मानते हैं
मगर वो बदलेंगे नहीं
क्यूंकि
बन्दर गुलाटी मारना थोड़े ही छोड़ता है.