बात नहीं, तो शुरुवात नहीं, तो मुलाक़ात नहीं, तो साथ नहीं,
तो क्या दिन क्या रात,
इतनी न बिगड़े बात इसलिए चुप न रहो
वर्ना चुप 'चुपचाप' संवाद नहीं रिश्ता भी निगल जाए
समय पिघल बह जाए, मौक़ा लौट न आये, बस मन पछताए
होती बात, तो होती शुरुवात, फिर मुलाक़ात और फिर साथ
न होता ऐसा अंत जैसे शून्य अनंत...............................
No comments:
Post a Comment