ज़िन्दगी बग़ावत उगल रही है
कहीं एक सहमी सी आग सुलग रही है.
लपटों की आंच ही नहीं,
आँखों में चुभने वाला धुआं भी नज़र अंदाज़ कर रहे हैं हम
एवज में इंसानियत जलकर राख हो रही है.
कहीं एक सहमी सी आग सुलग रही है.
लपटों की आंच ही नहीं,
आँखों में चुभने वाला धुआं भी नज़र अंदाज़ कर रहे हैं हम
एवज में इंसानियत जलकर राख हो रही है.
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