Sunday, 15 September 2013

राख

ज़िन्दगी बग़ावत उगल रही है
कहीं एक सहमी सी आग सुलग रही है.
लपटों की आंच ही नहीं,
आँखों में चुभने वाला धुआं भी नज़र अंदाज़ कर रहे हैं हम
एवज में इंसानियत जलकर राख हो रही है.

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