Sunday, 15 September 2013

खुशफ़हमी

जो घटा ही नहीं हमारे दरमियाँ वो भी सच सा लगता  है
जो कल था ही नहीं हर बात उसी कल की है ऐसा लगता है
जी चुके पूरी एक ज़िन्दगी तस्सवुर में
जो ख़्वाब ही रहा वही सच सा लगता है
इसे वहम कहें या नामुराद खुशफ़हमी
इसी वजह से तो आज भी जीना अच्छा लगता है.

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