आईने में ख़ुद से मुख़ातिब हो
दो बातें जो कीं वो ग़ज़ल हो गयी
खुद से शिकायतें जो थीं वो नज़्म हो गयी
वक़्त की हांड़ी में उबलते कुछ सवाल थे
उन्हें हिलाया
परतें उधेड़ी तो अफ़साने बन गए
समझोतों की सलीब पर लटके
कुछ सुलगते सच थे
जिन्हें छेड़ दिया तो शायरी हो गयी
भीतर आग थी
जिसे कागज़ पर उगल दिया तो
कविता हो गयी
न शब्द चुने, न उनका वजन तोला
न उन्हें सजाया-संवारा
फिर भी वो कोई गहरी बात कह गए
किसी के दिल को छू गए
किसी के मन में चुभ गए
किसी को प्रेरित
तो किसी को उद्वेलित कर गए
रचनाकार की रचनाधर्मिता सफल हो गयी
फिर से आईने में ख़ुद से मुख़ातिब हो
दो बातें जो कीं वो फिर
एक नयी ग़ज़ल हो गयी.
दो बातें जो कीं वो ग़ज़ल हो गयी
खुद से शिकायतें जो थीं वो नज़्म हो गयी
वक़्त की हांड़ी में उबलते कुछ सवाल थे
उन्हें हिलाया
परतें उधेड़ी तो अफ़साने बन गए
समझोतों की सलीब पर लटके
कुछ सुलगते सच थे
जिन्हें छेड़ दिया तो शायरी हो गयी
भीतर आग थी
जिसे कागज़ पर उगल दिया तो
कविता हो गयी
न शब्द चुने, न उनका वजन तोला
न उन्हें सजाया-संवारा
फिर भी वो कोई गहरी बात कह गए
किसी के दिल को छू गए
किसी के मन में चुभ गए
किसी को प्रेरित
तो किसी को उद्वेलित कर गए
रचनाकार की रचनाधर्मिता सफल हो गयी
फिर से आईने में ख़ुद से मुख़ातिब हो
दो बातें जो कीं वो फिर
एक नयी ग़ज़ल हो गयी.
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