Monday, 16 September 2013

फिर एक नयी ग़ज़ल

आईने में ख़ुद से मुख़ातिब हो 
दो बातें जो कीं वो ग़ज़ल हो गयी
खुद से शिकायतें जो थीं वो नज़्म हो गयी
वक़्त की हांड़ी में उबलते कुछ सवाल थे
उन्हें हिलाया  

परतें उधेड़ी तो अफ़साने बन गए
समझोतों की सलीब पर लटके

कुछ सुलगते सच थे
जिन्हें छेड़ दिया तो शायरी हो गयी
भीतर आग थी 

जिसे कागज़ पर उगल दिया तो 
कविता हो गयी
न शब्द चुने, न उनका वजन तोला

न उन्हें सजाया-संवारा
फिर भी वो कोई गहरी बात कह गए
किसी के दिल को छू गए

किसी के मन में चुभ गए
किसी को प्रेरित 

तो किसी को उद्वेलित कर गए
रचनाकार की रचनाधर्मिता सफल हो गयी
फिर से आईने में ख़ुद से मुख़ातिब हो 

दो बातें जो कीं वो फिर
एक नयी ग़ज़ल हो गयी.

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