Sunday, 15 September 2013

इस शहर नाम के जंगल में

इस शहर नाम के जंगल में पता मिले 'इंसानियत' का 
तो बता देना
कोई 'दोस्त' मिले

तो बता देना...
शराफ़त के लिबास में लिपटे 'आदमखोरों' से निजात,
जो मिल जाये सो निगल जाएँ, ऐसे आँखें गढ़ाए 'गिद्ध' पलक झपकाएं,
घात लगाये 'चीतों' के इरादे नेक हो जाएँ 

तो बता देना...
इस शहर नाम के जंगल में जिस दिन फिर से सूरज उगे

तो बता देना...
किसी को जीने की 'सार्थक वजह' मिले,
'मैं' की भीड़ में लापता 'हम' मिले,
तेरा-मेरा खोया 'सुकूं' मिल जाए

तो बता देना...
रास्तों को मंज़िल, मंज़िलों को मक़सद मिल जाए

तो बता देना...
फ़सादों के बवंडर थम जाएँ, रिश्तों से खुशबुएँ महकें
तेवर नहीं, मुस्कुराहटें हों चार सूं

तो बता देना....
पेशानी पर बल नहीं, नज़रों में छल नहीं, 

चाल में चालें थम जाएँ,
हाथों से गले न नपे, हाथ मिले

तो बता देना....
बारिशों में खूं और तेज़ाब नहीं 'पानी' बरसे
जज़्बात की बंजर हुई ज़मीन पर 'मोहब्बत की फसलें' हों
आग 'आग ' नहीं होम हो जाए 

तो बता देना ....
सर्द मौसम हों 'संवेदनाएं' नहीं, 

गर्माइश रिश्तों में हो मिज़ाज में नहीं
आसमान में चील-कौए न मंडराए, 

तोता-मैना आज़ादी से पंख फड़फडाये,
सच, यकीन, हौसला नहीं , 

खौफ़, ख़तरा, स्वार्थ, कायरता पलायन कर जाएँ 
तो बता देना...
इन्सान जागे, शैतान दफ़्न हो जाए 

तो बता देना...
आईने जब सच बोलने लगें, 

परछाई जब साथ न छोड़े
आंसू झूठ न बोले, मैं तुझसे, तू मुझसे,
हम एक-दूसरे से और ख़ुद से नज़रें मिलाने के क़ाबिल हो जाएँ

तो बता देना..
ज़िन्दा रहा तब तक, तो लौट आऊंगा,
ये जंगल शहर हो गया, तो ज़रूर लौट आऊंगा.

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