Monday, 16 September 2013

गर्मियों की छुट्टियां


माँ के हाथ का कैरी का पन्हा, गली के नुक्कड़ की दुकान से ली चार आने की बर्फ, आठ आने के दही से बनी मलाईदार, मिट्टी के  कुल्हड़  वाली लस्सी यानी गर्मियों की  छुट्टियां …
पापा के बाज़ार से लाये दशहरी आम, आम से सने हाथ और तर होंठ, फिर भी आम की गुठलियों पर भाई -बहन की हाथ -पाई यानी  गर्मियों  की  छुट्टियाँ ….
चूल्हे पर पकी दादी के हाथ की बेसन की रोटी, बेंगन का भर्ता, दही में चूरी बासी रोटियां, महेरी,लपसी और सरसों के तेल में डूबा   चावल का खींच यानी गर्मियों की  छुट्टियां...
बर्फ की मलाई वाली दिए की शरबती चुस्की, महाराज बाड़े की मटके वाली कुल्फी,कैंथ और बेर से खट्टे दांत, टीन के कनस्तर से चुरायी  नमक में लिपटी गीली इमलियाँ यानी गर्मियों की छुट्टियाँ …
सौंधी -सौंधी खुशबू वाली पानी से तर, गर्म लू के थपेड़े झेलती खस की टटीयां, मिटटी के मटको वाली प्याऊ, जामुन की गुठलियों से रंगी, पतंग के माजे से कटी हथेलियाँ, यानी गर्मियों की छुट्टियाँ …
तकियों के नीचे दबे दस पैसे किराये पर लिए नंदन,चम्पक, चंदामामा,जेबों और टीन के में खनकते कंचे यानी गर्मियों की छुट्टियाँ…
खाली माचिस के खोखों, पुराने डाक टिकटों पर होड़, गर्मी से झुलसती दोपहर में  चोरी -छुपे पच्चीस पैसे में दुबे जी की दुकान से  किराये पर साइकिल ले उड़ जाना, दोस्तों के साथ सूनसान शहर नापकर आना , रेस लगाना, पकडे जाने पर पापा की फटकार यानी  गर्मियों  की छुट्टियाँ....
शाम से पहले ही छत पर चढ़ अँधेरा होने तक  ‘काट्टा हो, काट्टा हो ’ चिल्ला -चिल्लाकर पेंच  लडाना, कटी पतंग लूटने को पागलों  की तरह भागना, पेड़ों पर चढ़ जाना, गिरकर घुटने कोहनियाँ  छिलवाकर हर रोज़ माँ की डांट खाना फिर भी अगले दिन बाज़ न आना यानी गर्मियों की छुट्टियाँ …
बुआ,मामा, मौसी के घर धमा-चौकड़ी, उनके लाड पर इतराना, सारी ज़िदें मनवाना, गाँव के तालाब में डुबकियाँ लगाना यानी गर्मियों  की छुट्टियाँ …
छत पर पानी का छिडकाव कर लाइन से गद्दे लगाकर खुले आसमान के नीचे सोना, आइस -पाईस, कैरम, सितोलिया, लूडो, सांपसीडी,  व्यापार, लंगड़ीटांग, गिल्लीडंडा,ताश के पत्तों के खेलों पर झगड़ना, रूठना -मनाना, रोज़ नए खेल रचना यानी गर्मियों की छुट्टियाँ…
चार आने के आठ गोलगप्पे चार दोस्तों के साथ बांटकर खाना, सारे मोहल्ले को दिन रात सर पर उठाये रखना, चबूतरे वाली बूड़ी नानी की नाक में दम कर उसकी खूब सारी गालियाँ खाना और बेशर्मी से हँसना यानी गर्मियों की छुट्टियाँ...
कभी ख़त्म न हो हर पल यही दुआ करना यानी गर्मियों की छुट्टियाँ...
क्यूँ था इतना छोटा बचपन और इतनी छोटी वो गर्मियों की छुट्टियां...
मन नहीं भरा, बहोत याद आती हैं आज भी वो गर्मियों की छुट्टियाँ.

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