Friday, 27 September 2013

उसके जाने के बाद





उसके साथ ही सारी रौशनी चली गयी
अब सूरज को घर लाने से भी कुछ नहीं होगा.  

उसकी हथेलियों में ही मेरी तक़दीर की लक़ीरें थीं
अब उस तक़दीर के पलट जाने से भी कुछ नहीं होगा.

उसके होठों में मेरी हर मुस्कान का सबब था
अब बेशुमार खुशियाँ बरस जाने से भी कुछ नहीं होगा.

रूह की ठंडक थी वो
अब  आँगन में चांदनी उतर आने से भी कुछ नहीं होगा.

वो मौसम थी, हवा थी, सुकूं थी, सांस थी वो
अब सारी क़ायनात क़दमों में सिमट आने से भी कुछ नहीं होगा..

माना मैं देर से घर आया था माँ
मगर तूने जाने में जल्दबाज़ी क्यूँ कर दी

तेरे होने से ही तो मेरे होने के मानी थे
अब रोज़ वक़्त पर घर आने से भी कुछ नहीं होगा
अब रोज़ वक़्त पर घर आने से भी कुछ नहीं होगा।

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