शोर-शराबे और भीड़ भरे,
शोहरतों के वो मेले भी वक़्ति थे
बदलते हर मौसम की तरह,
मेलों में आसमान से टकराने को आतुर
तो कभी ज़मीन छूते, हिचकोले खाते
कामयाबी के ऊंचे-ऊंचे झूले भी
वक़्ति थे जिंदगी के उतार-चढ़ाव की तरह
मन की दूकान पर लटकी
बिकने को आतुर रंग -बिरंगी ख्वाहिशें
नीली-पीली, गुलाबी वक़्ति थीं
खाओ-न-खाओ पिघलकर बह जाने वाली
आइसक्रीम की तरह
फिर भी हम सबने सिर्फ़ और सिर्फ़
यही सब जुटाने में
सारा वक़्त ज़ाया कर दिया.
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