Monday, 16 September 2013

बेज़ुबान नज़्में


चाँद, सितारे, बिजली, बादल, अश्क, अहसास, इबादत
ओस की बूंदे, झरने, पत्ते, दिल, मासूम मोहब्बत ...
मुझसे पहले जो शायर आये, ये सारे लफ्ज़ ले उड़े
बचे -खुचे जो रूखे -सूखे से थे
रूमानी शायरी से न जुड़े ...
मेरे हिस्से आये बस कुछ ख्याल
मेरे बेज़ुबान ख़याल
जो मेरे जहाँ को मुकम्मल बनाने को काफी थे ...
उनकी तरह मेरे ख्याल खनकते सिक्कों में तो
तब्दील न हुए पर किसी मजबूर की आवाज़ बन
उसकी व्यथा कह गए
जिंदगी के यथार्त से दो -दो हाथ कर गए
कभी सच का अक्स तो
कभी हक़ीक़त का सबब बन गए
मैं लिखता नहीं मगर जो कहता हूँ
वो बेमानी, बेमक़सद नहीं
इस बात का सुकून मुझे दे गए
अब ख़ुद से नज़रे नहीं चुरानी पड़ती
शब्दों की तलाश में शब्दकोष खंकालने नहीं पड़ते
बस ईमानदारी से अपने आसपास नज़रें दौडानी
और ख़ुद के भीतर झांकना पड़ता है
बेशक मैं दुरुस्त काफ़िये वाली शायरी नहीं लिख पाता
पर जो कह पाता हूँ उस पर शर्मसार नहीं होना पड़ता ….
और जिन्हें शर्मसार होना पड़ता है
वो ख़ुद  को टटोलने पर मजबूर हो जाते हैं
और मेरे पास लफ्ज़ नहीं फिर भी
मुझे कुछ और कहने की वजह मिल जाती है  
और मैं फिर से कुछ बेज़ुबान नज़्में बुनने  लगता हूँ.

No comments:

Post a Comment