आधी खुली खिड़की
पूरी पिघली मोमबत्ती
बारिश के छीटों से गीली चिलमन
एक नम तकिया
दीवार पर टंगी हवा से टेड़ी
गुज़रे लम्हों की गवाह
मुस्कुराती तस्वीरें
कांच के मर्तबान में क़ैद
सांस लेती रंग-बिरंगी मछलियाँ
प्याले में तैरती गुलाब की पंखुडियां
नींद से बोझिल दो पलकें
'न' बिखरी, 'संवरी' ज़ुल्फें
उनमें उलझा आधा बासी
मगर अब तक महक रहा
खुशबुएँ लुटाने को आतुर
साबुत गजरा
पपड़ियों के नीचे से
झांकते बेसुध होठों की
अब तक ताज़ा सी लिपस्टिक
बिस्तर पर न कोई सिलवट
बस उसकी पेशानी पर
उभर आयीं ढाई लकीरें
कह रही थीं गुज़री रात की कहानी
'रात' जो आज फिर कटी इंतज़ार में
पूछती रही वो रात लगातार
क्यूँ चुना तुमने
सिर्फ और सिर्फ इंतज़ार
थक चुकी रात
सोना चाहती थी
कमसकम एक बार
बिना इंतज़ार
सुकूँ से पलकें मूंदे
आधी खुली खिड़की को
पूरी बंद करके
एक बार.
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