वजूद में पड़ी दरारों को और गहरे चीरकर ही उसे सीना होगा
मर-मरकर नहीं किसी नए मक़सद के लिए जीना होगा,
वर्ना वक़्त का तूफ़ान होंसले डिगा देगा
सेहरा से तपते इरादों को भिगा देगा,
दरारें 'दर्रा' बनकर सबकुछ निगल जाएँगी
बंद मुट्ठियाँ न जाने कब खुली हथेलियों में बदल जाएँगी.
मर-मरकर नहीं किसी नए मक़सद के लिए जीना होगा,
वर्ना वक़्त का तूफ़ान होंसले डिगा देगा
सेहरा से तपते इरादों को भिगा देगा,
दरारें 'दर्रा' बनकर सबकुछ निगल जाएँगी
बंद मुट्ठियाँ न जाने कब खुली हथेलियों में बदल जाएँगी.
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