Sunday, 15 September 2013

जी के दिखा

बड़े बाप के बेटे थे,
जब से पैदा हुए लेटे थे,
क़ुसूर उनका नहीं,
खून में ही थीं अय्याशियाँ ...
बेशुमार छाई थी खुमारियां
ख़ुदा के करम से
बेपनाह थीं मेहरबानियाँ....
मुश्किलें कम,
ज़्यादा थीं आसानियाँ;
बस; यही बड़ी मुश्किल हो गयी
न आया झूझना, न लड़ना, न जीतना.
आसां-आसां सी ज़िन्दगी कुछ इतनी आसां थी की
जब असल में जीने की बारी आई (हमारी तरह)
तो लग गयी जनाब की
बौराए से फिरते थे,
फ.... गयी जनाब की.  

(कुछ शब्दों का चुनाव पसंद न आया हो तो माफ़ करें,
उस भाव को व्यक्त करने वाला पर्यायवाची मुझे नहीं सूझा. )

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