Monday, 16 September 2013

दरख़्त

मन के आँगन में एक दरख़्त है
जो हर मौसम में खिला रहता है
वही है जो जीवन को सांसें देता है
वही है जो साँसें चुकने तक भी 

जीवित रहता है
कभी न बूढ़ा होने वाला ये दरख़्त...
जड़ों में माँ की परवरिश 

पिता की सीख
गुरु का खाद पानी
ख्वाहिशों सी लम्बी टहनियों पर 

लटके पुराने लम्हे,
कच्ची-पक्की यादों की पूरी एक फ़सल
फूटती कलियों में मासूम बचपन का अक्स
खिलते फूलों में बहकती जवानी की तस्वीर
खट्टे-मीठे फलों से से लदा-फदा 

शरारतें करता
तने की झुर्रियों से झलकती शिथिलता नहीं 

बल्कि तजुर्बे का तेज
इसी दरख़्त पर तिनकों एक घोसला है
जिसमें यादों का पूरा एक कुनबा रहता है
मन के आंगन में एक दरख़्त है
जो हर मौसम में खिला रहता है.

No comments:

Post a Comment