Sunday, 15 September 2013

उम्मीद


मेरी सख्त हिदायत पर सितारों की फ़ौज साथ लिए
सारी -सारी रात जाग चाँद करता रहा पहरेदारी
दरख्तों के साए भी थे चौकन्ने
झींगुर सतर्क, न चमगादड़ सोये, न उल्लूओं ने ली जम्हाई
फिर भी, आज फिर चुपके से वो याद न जाने कहाँ से आई
जो ले उडी मेरी नींद.
गुज़रे  मगर  ताज़े  किस्सों  की,
बीती  मगर  न  बिसुरी  बातों  की,
पिछली  मगर  जानी - पहचानी  आहटों  की,
धुंधले  से  ख्वाबों , गीले -सूखे  ख्यालों  की,
इतनी  थी  भीड़  की नींद आज फिर खो गयी
हर -रोज़ के इस सिलसिले से थक -कर बोझिल
एक आँख आखिर सो गयी मगर दूसरी आज भी
सुबह होने तक राह तकती रही न जाने किसकी
उसे अब भी  उम्मीद  है तो कोई  क्या  करे
उसकी  इसी  उम्मीद  ने  उससे  नींद  छीनी है
फिर भी उसे उम्मीद  है तो कोई  क्या  करे .

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