मेरी सख्त हिदायत पर सितारों की फ़ौज साथ लिए
सारी -सारी रात जाग चाँद करता रहा पहरेदारी
दरख्तों के साए भी थे चौकन्ने
झींगुर सतर्क, न चमगादड़ सोये, न उल्लूओं ने ली जम्हाई
फिर भी, आज फिर चुपके से वो याद न जाने कहाँ से आई
जो ले उडी मेरी नींद.
गुज़रे मगर ताज़े किस्सों की,
बीती मगर न बिसुरी बातों की,
पिछली मगर जानी - पहचानी आहटों की,
धुंधले से ख्वाबों , गीले -सूखे ख्यालों की,
इतनी थी भीड़ की नींद आज फिर खो गयी
हर -रोज़ के इस सिलसिले से थक -कर बोझिल
एक आँख आखिर सो गयी मगर दूसरी आज भी
सुबह होने तक राह तकती रही न जाने किसकी
उसे अब भी उम्मीद है तो कोई क्या करे
उसकी इसी उम्मीद ने उससे नींद छीनी है
फिर भी उसे उम्मीद है तो कोई क्या करे .
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