मेरे ज़िद्दी ख़्वाब अब मेरे बस में नहीं रह गए हैं
जिन्हें चुना थे मैंने, बुना थे मैंने,
बोया था मैंने, सींचा था मैंने
बरसों जिनकी परवरिश की मैंने
अब वो अपने पैरों पर खड़े हो इतने ज़िद्दी हो गए हैं
की मेरे बस में नहीं रह गए हैं
पाला -पोसा था मैंने
हक़ीक़त के साए से महफूज़ रखा
यथार्थ की धूप, आंधी- तूफ़ान से
हिफाज़त की जिनकी
जागती आँखों में सजाया था जिन्हें
खुद जागकर लोरियां गाकर सुलाया था
किसी रात जिनका सिराहना बनकर
कभी आलिंगन में लेकर सोया था जिन्हें
वही मेरे वजूद से भी बड़े हो गए हैं
मेरे ज़िद्दी ख़्वाब अब मेरे बस में नहीं रह गए हैं
ज़िद है उनकी वो सच होना चाहते हैं
अब रातों को ही नहीं
दिन भर मन की मुंडेर पर बैठे
टकटकी लगाए ताकते हैं मुझे
मैं नज़रें चुराता हूँ तो
ख्वाहिशों की दीवारों से सर टकराते हैं
कभी मुझे, कभी मेरे 'मैं' को ललकारते हैं,
हर पल मुझे चिड़ाते हैं,
मेरा मज़ाक उड़ाते हैं
अब वो मुझसे ज्यादा कद्दावर हो गए हैं
इसलिए मेरे ज़िद्दी ख़्वाब मेरे बस में नहीं रह गए हैं
मैं थकता हूँ तो थकने नहीं देते
थमता हूँ तो थमने नहीं देते
हारता हूँ, तो हारने नही देते
न ख़ुद चैन से सोते, न मुझे सोने देते हैं...
फिर भी मुझे वो अच्छे लगने लगे हैं क्यूंकि
सच्चा ख्वाब तो वही है
जो नींद में न आये बल्कि नींद छीन ले
इसीलिए उनकी ये ज़िद अब मुझे अच्छी लगने लगी है
जिंदगी फिर एक बार नयी सी लगने लगी है
अब करवट बदलता हूँ तो
उन्हें सिराहने देख राहत पाता हूँ,
मालूम है, वो मुझे थकने नहीं देंगे,
रुकने नहीं देंगे तब तक
जब तक वो सच नहीं हो जाते...
Badi door se aaya hoon ek lamba safar tay karke kuch der aram karloo ye soch kar thahar gaya....
ReplyDeletewah Sangram ji wah...
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